हनुमान चालीसा अर्थ सहित हिंदी में
यहाँ हनुमान चालीसा का हर दोहा और हर चौपाई है। हर एक के नीचे आसान हिंदी में उसका अर्थ लिखा है, और साथ में उसका भाव भी थोड़ा विस्तार से समझाया है।
यह अर्थ हमने अपनी समझ से आसान भाषा में लिखा है। कुछ चौपाइयों को विद्वान अलग तरह से भी समझाते हैं। और गहराई से समझना हो, तो जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी की “महावीरी व्याख्या” जैसी किताबें पढ़ें।
सिर्फ़ चालीसा पढ़नी हो या उसकी PDF चाहिए, तो हनुमान चालीसा हिंदी में वाला पेज खोलें। एक-एक शब्द का अर्थ शब्दार्थ वाले पेज पर (अंग्रेज़ी में) मिलेगा, और चालीसा कब और कैसे लिखी गई, यह इसके इतिहास वाले पेज पर (अंग्रेज़ी में) पढ़ें।
शुरुआत के दोहे · चौपाई 1 से 10 · 11 से 20 · 21 से 30 · 31 से 40 · आखिरी दोहा · PDF · सवाल
शुरुआत के दोहे
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥
अर्थ: श्रीगुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को साफ करके मैं श्री रघुबर (श्रीराम) के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल देने वाला है: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
भावार्थ: तुलसीदास जी पाठ की शुरुआत गुरु को प्रणाम करके करते हैं। जब तक मन पर घमंड और अज्ञान की धूल जमी है, भगवान का यश ठीक से नहीं गाया जा सकता; गुरु की कृपा ही यह धूल साफ करती है। हनुमान चालीसा श्रीराम के यश से शुरू होती है, क्योंकि हनुमान जी की सारी महिमा राम-भक्ति में ही है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
अर्थ: अपने को बुद्धिहीन जानकर मैं पवन-कुमार हनुमान जी का स्मरण करता हूँ। हे हनुमान जी, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे क्लेश (दुख) और विकार (मन के दोष) दूर कीजिए।
भावार्थ: भक्त सच्चे मन से मान लेता है कि सिर्फ़ अपनी अक्ल के भरोसे वह भगवान तक नहीं पहुँच सकता। इसलिए वह तीन चीज़ें माँगता है: बल (शरीर और मन की ताकत), बुद्धि (सही और गलत की समझ) और विद्या (ज्ञान)। “कलेस” यानी बाहर के दुख, और “बिकार” यानी मन की बुराइयाँ, जैसे काम, क्रोध, लोभ और मोह।
चौपाई 1 से 10
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
अर्थ: हे हनुमान जी, आपकी जय हो। आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे कपीश (वानरों के स्वामी), आपकी जय हो। आपकी कीर्ति तीनों लोकों में उजागर है।
भावार्थ: चालीसा की पहली चौपाई जयकार से शुरू होती है। “सागर” इसलिए कहा गया है, क्योंकि हनुमान जी के ज्ञान और गुणों का कोई अंत नहीं है। “तिहुँ लोक” यानी स्वर्ग, धरती और पाताल, तीनों में उनका यश फैला है।
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
अर्थ: आप श्रीराम के दूत हैं और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप अंजनी-पुत्र और पवनसुत (पवन देव के पुत्र) नाम से जाने जाते हैं।
भावार्थ: हनुमान जी की सबसे पहली पहचान “राम दूत” है: उनका सारा बल श्रीराम के काम के लिए है। माँ अंजना के बेटे होने से वे अंजनी-पुत्र कहलाते हैं, और पवन देव के बेटे होने से पवनसुत।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
अर्थ: हे महावीर, आप बड़े पराक्रमी हैं और आपके अंग वज्र जैसे दृढ़ हैं। आप बुरी बुद्धि को दूर करते हैं और अच्छी बुद्धि वालों के साथी हैं।
भावार्थ: “बजरंगी” शब्द “बज्र” (वज्र) और “अंग” से बना है, यानी वज्र जैसे अंगों वाले। यहाँ तुलसीदास जी हनुमान जी के बल के साथ उनकी बुद्धि की भी बात करते हैं: वे मन से गलत सोच हटाकर सही राह दिखाते हैं।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
अर्थ: आपका रंग सोने जैसा है और आप सुंदर वेश में शोभा पाते हैं। आपके कानों में कुंडल हैं और बाल घुँघराले हैं।
भावार्थ: यहाँ हनुमान जी के रूप की झलक दी गई है, ताकि पाठ करते समय हम मन में उनका यह रूप देख सकें। “कंचन बरन” यानी सोने जैसा चमकता रंग।
हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
अर्थ: आपके हाथों में वज्र और ध्वजा शोभा पाते हैं, और कंधे पर मूँज का जनेऊ सजा है।
भावार्थ: वज्र ताकत की निशानी है और ध्वजा जीत की। मूँज (एक तरह की घास) का जनेऊ उनके संयम और पवित्र जीवन की याद दिलाता है।
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥
अर्थ: आप भगवान शंकर के अंश और केसरी जी के पुत्र हैं। आपका तेज और प्रताप महान है, सारा जगत आपकी वंदना करता है।
भावार्थ: “संकर सुवन” कहकर हनुमान जी को भगवान शिव का अंश माना गया है। वानरराज केसरी उनके पिता हैं, इसलिए वे केसरीनंदन कहलाते हैं।
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
अर्थ: आप विद्वान, गुणवान और बहुत चतुर हैं, और श्रीराम का काम करने के लिए सदा उत्सुक रहते हैं।
भावार्थ: हनुमान जी की सारी विद्या और चतुराई एक ही काम में लगती है: राम का काम। ज्ञान और गुण तभी काम के हैं जब वे किसी अच्छे काम में लगें।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लषन सीता मन बसिया॥
अर्थ: आप प्रभु श्रीराम की कथा सुनने के रसिया (प्रेमी) हैं। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी आपके मन में बसते हैं।
भावार्थ: हनुमान जी को राम-कथा सुनने में बहुत आनंद आता है; माना जाता है कि जहाँ राम-कथा होती है, वहाँ वे ज़रूर आते हैं। “लषन” लक्ष्मण जी का ही नाम है, जो कई किताबों में “लखन” छपा मिलता है।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
अर्थ: आपने छोटा (सूक्ष्म) रूप धारण करके सीता जी को दर्शन दिया, और विकट (भयंकर) रूप धारण करके लंका जलाई।
भावार्थ: अशोक वाटिका में हनुमान जी छोटे रूप में पेड़ के पत्तों में छिपकर सीता जी से मिले, ताकि माँ डरें नहीं। बाद में विशाल रूप लेकर उन्होंने लंका जला दी। जैसा मौका हो, वे वैसा ही रूप ले लेते हैं।
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥
अर्थ: आपने भीम (विशाल) रूप धारण करके असुरों का संहार किया और श्रीरामचंद्र जी के काम सँवारे।
भावार्थ: लंका के युद्ध में हनुमान जी ने बहुत से राक्षसों को मारा। यहाँ भी उनका सारा पराक्रम अपने लिए नहीं, श्रीराम के काम के लिए है।
चौपाई 11 से 20
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
अर्थ: आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जीवन दिया। तब श्री रघुबीर (श्रीराम) ने प्रसन्न होकर आपको हृदय से लगा लिया।
भावार्थ: युद्ध में मेघनाद की शक्ति लगने से लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे। हनुमान जी रातों-रात द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी लाए, और बूटी न पहचान पाने पर पूरा पर्वत ही उठा लाए। “सजीवन” इसी संजीवनी बूटी को कहा गया है।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
अर्थ: श्री रघुपति (श्रीराम) ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा: तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।
भावार्थ: श्रीराम को भरत जी सबसे प्यारे थे। हनुमान जी को भरत जितना प्यारा कहकर श्रीराम ने दिखा दिया कि वे उन्हें कितना चाहते थे।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
अर्थ: “हज़ार मुखों वाले शेषनाग तुम्हारा यश गाते हैं”, ऐसा कहकर श्रीपति (श्रीराम) आपको गले लगाते हैं।
भावार्थ: शेषनाग के हज़ार मुख माने जाते हैं। श्रीराम कहते हैं कि तुम्हारा यश इतना बड़ा है कि उसे हज़ार मुखों वाले शेष ही गा सकते हैं, और प्रेम से हनुमान जी को गले लगाते हैं। “श्रीपति” यानी श्री (सीता जी) के पति।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
अर्थ: सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, बड़े-बड़े मुनि, नारद जी, सरस्वती जी और शेषनाग भी आपका यश गाते हैं।
भावार्थ: यह और अगली चौपाई भी श्रीराम ही कह रहे हैं: ऋषि, देवता और मुनि, सब हनुमान जी का यश गाते हैं। “सारद” सरस्वती जी हैं और “अहीसा” नागों के राजा शेषनाग।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
अर्थ: यमराज, कुबेर और दिशाओं के रक्षक (दिक्पाल) भी आपका यश गाते हैं; फिर कवि और विद्वान उसका पूरा वर्णन कहाँ से कर सकते हैं।
भावार्थ: इन तीन चौपाइयों का भाव यह है कि हनुमान जी के यश का कोई अंत नहीं है। जब देवता भी उसे गाते हैं, तो कोई कवि उसका पूरा बखान नहीं कर सकता। “कोबिद” यानी विद्वान।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
अर्थ: आपने सुग्रीव पर उपकार किया: उन्हें श्रीराम से मिलाया और राजा का पद दिलाया।
भावार्थ: बाली से डरकर ऋष्यमूक पर्वत पर रहने वाले सुग्रीव को हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण जी से मिलाया। श्रीराम ने बाली को मारकर सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
अर्थ: विभीषण ने आपकी सलाह (मंत्र) मानी और वे लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है।
भावार्थ: लंका में हनुमान जी विभीषण से मिले थे, और उनकी बात से विभीषण को श्रीराम की शरण में जाने की हिम्मत मिली। राम की शरण में आकर वे लंका के राजा बने। यहाँ “मंत्र” का अर्थ सलाह है।
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
अर्थ: जो सूर्य युग-सहस्र योजन दूर है, उसे आपने मीठा फल समझकर निगल लिया।
भावार्थ: यह हनुमान जी के बचपन की कहानी है: उगते लाल सूर्य को फल समझकर वे उसे खाने आसमान में उड़ गए। “जुग सहस्र जोजन” कहकर बताया है कि सूर्य बहुत दूर है। कुछ लोग इन संख्याओं का गुणा करके जो दूरी निकालते हैं, वह सूर्य की असली दूरी के करीब है; इस पर नीचे सवाल 7 देखें।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
अर्थ: प्रभु श्रीराम की अँगूठी मुँह में रखकर आप समुद्र लाँघ गए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
भावार्थ: सीता जी की खोज में जाते समय श्रीराम ने हनुमान जी को पहचान के लिए अपनी अँगूठी दी थी, जिस पर राम-नाम लिखा था। तुलसीदास जी कहते हैं कि राम का नाम साथ हो तो सौ योजन का समुद्र पार करना कोई अचरज नहीं।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
अर्थ: संसार में जितने भी कठिन काम हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।
भावार्थ: भक्त कठिन समय में हनुमान जी को याद करते हैं, क्योंकि उनकी कृपा पर भरोसा करने से मन में साहस आता है और कठिन काम आसान लगने लगता है। यह भरोसे की बात है, अपनी मेहनत छोड़ने की नहीं।
चौपाई 21 से 30
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
अर्थ: आप श्रीराम के द्वार के रखवाले हैं। आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
भावार्थ: भाव यह है कि श्रीराम तक पहुँचने का रास्ता हनुमान जी से होकर जाता है। इसीलिए राम-भक्त पहले हनुमान जी को याद करते हैं।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना॥
अर्थ: जो आपकी शरण में आता है, उसे सब सुख मिलते हैं। जब आप रक्षक हों, तो किसी का डर नहीं रहता।
भावार्थ: “रच्छक” यानी रक्षक। शरण में आने का अर्थ है पूरा भरोसा करना, और ऐसा भरोसा मन से डर निकाल देता है।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
अर्थ: अपने तेज (शक्ति) को आप ही सँभाल सकते हैं। आपकी हाँक (गर्जना) से तीनों लोक काँप उठते हैं।
भावार्थ: हनुमान जी की ताकत इतनी बड़ी है कि उसे कोई और नहीं रोक सकता। एक कहानी के अनुसार ऋषियों के शाप से वे अपना बल भूले रहते थे; समुद्र लाँघने से पहले जाम्बवान जी ने उन्हें उसकी याद दिलाई। इसलिए कुछ विद्वान “सम्हारो” का अर्थ “याद करना” भी बताते हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
अर्थ: जब महावीर हनुमान जी का नाम लिया जाता है, तब भूत और पिशाच पास नहीं आते।
भावार्थ: भक्तों का विश्वास है कि हनुमान जी का नाम डर दूर करता है। इसीलिए अँधेरे या अकेलेपन में डर लगने पर लोग हनुमान चालीसा पढ़ते हैं: नाम लेने से मन को हिम्मत मिलती है।
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
अर्थ: वीर हनुमान जी का निरंतर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर होती है।
भावार्थ: यह भक्त की श्रद्धा की बात है। जप से मन शांत और मज़बूत होता है, और बीमारी में भी धीरज मिलता है। पर बीमारी में डॉक्टर की सलाह और इलाज भी उतना ही ज़रूरी है; जप उनके साथ करें, उनकी जगह नहीं।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
अर्थ: जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे हनुमान जी संकट से छुड़ाते हैं।
भावार्थ: “मन क्रम बचन” पर ध्यान दीजिए: सोच, काम और बोल, तीनों में सच्ची भक्ति। सिर्फ़ शब्द दोहराना काफी नहीं, रोज़ के जीवन में भी वही भाव होना चाहिए।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
अर्थ: तपस्वी राजा श्रीराम सबसे श्रेष्ठ हैं, और उनके सब काम आपने ही सँवारे।
भावार्थ: श्रीराम राजा होकर भी तपस्वी की तरह वन में रहे। ऐसे सबसे बड़े प्रभु के काम हनुमान जी ने पूरे किए: सीता जी की खोज, संजीवनी लाना और लंका का युद्ध।
और मनोरथ जो कोइ लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
अर्थ: जो कोई भी आपके पास अपना मनोरथ (इच्छा) लेकर आता है, वह जीवन में उसका असीम फल पाता है।
भावार्थ: भक्त मानते हैं कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना खाली नहीं जाती। इसका मतलब यह नहीं कि हर इच्छा वैसी ही पूरी होगी जैसी हम चाहते हैं; यह हनुमान जी पर भरोसे की बात है।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
अर्थ: चारों युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग) में आपका प्रताप है, और आपका यश सारे जगत में प्रसिद्ध है और उसमें उजाला फैलाता है।
भावार्थ: हनुमान जी चिरंजीवी माने जाते हैं, यानी वे हर युग में मौजूद रहते हैं। महाभारत में भी वे भीम से मिलते हैं और अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजते हैं।
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अर्थ: आप साधु-संतों के रक्षक हैं, असुरों का नाश करने वाले हैं और श्रीराम के दुलारे हैं।
भावार्थ: “निकंदन” यानी जड़ से खत्म करने वाला। एक तरफ़ अच्छे लोगों की रक्षा, दूसरी तरफ़ बुराई का अंत: यहाँ हनुमान जी के दोनों रूप साथ दिखते हैं।
चौपाई 31 से 40
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
अर्थ: आप आठ सिद्धियों और नौ निधियों के देने वाले हैं; यह वरदान आपको माता जानकी (सीता जी) ने दिया है।
भावार्थ: माना जाता है कि अशोक वाटिका में हनुमान जी से खुश होकर सीता जी ने उन्हें यह वरदान दिया। आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ कौन सी हैं, यह नीचे सवाल 5 में बताया है।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
अर्थ: आपके पास राम-भक्ति रूपी रसायन है, और आप सदा श्री रघुपति (श्रीराम) के दास बने रहते हैं।
भावार्थ: “रसायन” यानी ऐसी दवा जो नई जान डाल दे। यहाँ राम-भक्ति को ही रसायन कहा गया है, जो मन के रोग दूर करती है। हनुमान जी के पास यह सबसे बड़ा धन है, क्योंकि वे हमेशा राम के सेवक हैं।
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अर्थ: आपके भजन से भक्त श्रीराम को पा लेता है और जन्म-जन्म के दुख भूल जाता है।
भावार्थ: हनुमान जी की भक्ति करने से राम-भक्ति मिलती है। “बिसरावै” यानी भुला देना: राम का प्रेम मिलने पर भक्त पुराने दुख भूल जाता है।
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
अर्थ: ऐसा भक्त अंत समय में श्री रघुबर (श्रीराम) के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म ले, हरि-भक्त कहलाता है।
भावार्थ: भाव यह है कि सच्ची भक्ति इस जीवन के साथ खत्म नहीं होती। ऐसा भक्त अगले जन्म में भी भगवान का भक्त ही होता है।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
अर्थ: दूसरे देवताओं को मन में न रखकर भी, केवल हनुमान जी की सेवा से सब सुख मिल जाते हैं।
भावार्थ: इसका मतलब दूसरे देवताओं को छोटा बताना नहीं है। बात बस इतनी है कि हनुमान जी की भक्ति अपने आप में पूरी है, क्योंकि उसमें राम की भक्ति भी आ जाती है।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
अर्थ: जो बलवीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है।
भावार्थ: “सुमिरै” यानी याद करना। कठिन समय में हनुमान जी को याद करने से मन को साहस मिलता है और डर कम होता है; भक्त इसी को संकट कटना मानते हैं।
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥
अर्थ: हे स्वामी (गोसाईं) हनुमान जी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप मुझ पर गुरुदेव की तरह कृपा कीजिए।
भावार्थ: तीन बार “जै” कहकर भक्त पूरे मन से जयकार करता है। गुरु शिष्य पर बिना शर्त कृपा करता है और उसकी गलतियाँ सुधारता है; भक्त हनुमान जी से वैसी ही कृपा माँगता है।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
अर्थ: जो कोई इसका सौ (सत) बार पाठ करता है, वह बंधन से छूट जाता है और उसे महान सुख मिलता है।
भावार्थ: “सत” यानी सौ और “बंदि” यानी बंधन; संत इसे दुनिया के बंधनों से छूटना मानते हैं। कई भक्त किसी संकल्प के साथ सौ बार पाठ करते हैं।
जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
अर्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि मिलती है; इसके साक्षी गौरीश (भगवान शिव) हैं।
भावार्थ: यहाँ बताया गया है कि पाठ करने से क्या मिलता है (इसे फलश्रुति कहते हैं)। भक्त “सिद्धि” को मन की ताकत और काम की सफलता, दोनों अर्थों में लेते हैं। यह श्रद्धा की बात है; फल भगवान की कृपा और अपनी मेहनत से मिलता है।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
अर्थ: तुलसीदास सदा हरि (श्रीराम) के सेवक हैं। हे नाथ, मेरे हृदय में निवास कीजिए।
भावार्थ: अंत में तुलसीदास जी अपने को “हरि चेरा” (भगवान का दास) कहते हैं और कोई धन या पद नहीं माँगते, बस यह कि हनुमान जी उनके हृदय में बस जाएँ।
आखिरी दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लषन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ: हे पवनपुत्र, आप संकट हरने वाले और मंगल की मूर्ति हैं। हे देवताओं के राजा, आप श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी के साथ मेरे हृदय में निवास कीजिए।
भावार्थ: आखिरी दोहे में भक्त हनुमान जी को अकेले नहीं, पूरे राम-परिवार के साथ अपने दिल में बुलाता है, क्योंकि जहाँ हनुमान जी हैं, वहाँ श्रीराम भी हैं।
ध्यान दें: यह पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर के संस्करण के अनुसार है, और हर पंक्ति उससे मिलाकर जाँची गई है। कई किताबों और भजनों में कुछ शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, जैसे “और” की जगह “अरु”, “संकर” की जगह “शंकर”, “लषन” की जगह “लखन”, “रच्छक” की जगह “रक्षक” और “चलीसा” की जगह “चालीसा”। दोनों तरह से पाठ किया जाता है, दोनों ठीक हैं।
॥ जयघोष ॥
बोलो ..
॥ सियावर रामचंद्र की जय ॥
॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥
॥ उमापति महादेव की जय ॥
॥ वृंदावन कृष्ण चंद्र की जय ॥
॥ बोलो भाई सब संतन की जय ॥
॥ इति ॥
हनुमान चालीसा अर्थ सहित PDF
पूरी चालीसा और हर दोहे-चौपाई का आसान अर्थ, एक ही PDF में। फोन में रख लें या प्रिंट निकाल लें।
सिर्फ़ चालीसा की एक या दो पेज वाली PDF चाहिए, तो वह हनुमान चालीसा हिंदी वाले पेज पर मिलेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चालीसा के अर्थ को लेकर लोग अक्सर ये सवाल पूछते हैं।

